डा. दिलीप सिंह एडवोकट
हरितालिका तीज भादों महीने के शुक्ल पक्ष त्रृतीया को मनाया जाता है। उसको तीज भी कहते हैं। यह हस्त नक्षत्र के समय पड़ता है। यह भगवती माता पार्वती के लिए समर्पित व्रत है अत्यंत कठिन निर्जला व्रत करके भगवान शिव से विवाह करने का माता पार्वती को सौभाग्य मिला था तभी से व्रत मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 26 अगस्त के दिन पड़ रही है। यह व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति और इच्छानुसार वरदान मिलता है और उनका सुहाग सुरक्षित रहता है। यह व्रत निर्जला होता है अर्थात बिना चंद्रमा का दर्शन हुए पानी भी नहीं पी सकते हैं। विवाहित महिलाओं के अलावा कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को कर सकती हैं जो अच्छे पति की चाह रखती हैं। यद्यपि हरतालिका तीज की तिथि 25 अगस्त को दोपहर 12:34 पर लग रही है और इसका समापन 26 अगस्त को दोपहर 1:54 पर होगा लेकिन सूर्य के उदया तिथि के अनुसार यह 26 अगस्त को ही मनाया जायेगा।
इस व्रत में एक और बात है कि यदि एक बार व्रत रखा तो हमेशा के लिए रखना पड़ता है। यदि कभी व्रत रहने वाली महिला गंभीर स्थिति में हो तो दूसरी महिला या पति उसके स्थान पर व्रत रख सकता है। इस व्रत को रखने वाली महिला को दिन भर सोने का निषेध है और रात को जागरण भी करना पड़ता है।
इसका विधि विधान है कि सुबह स्नान करके श्रद्धा भक्ति के साथ व्रत के बाद सुहागिन महिला को श्रृंगार सामग्री कपड़े खाने पीने की वस्तु में फल और मिठाई आभूषण अपने शक्ति के अनुसार जो चरित्रवान हो उसको दान देते हैं। वैसे तो भगवती माता पार्वती की कथा हर कोई जानता है लेकिन जब वह सती के रूप का त्याग करके अग्नि में भस्म होकर हिमाचल के घर पार्वती के रूप में जन्म ली, तब बचपन में उन्होंने अन्न जल का सेवन भी छोड़ दिया और पत्ते खाकर एक पैर के अंगूठे पर खड़ी होकर घनघोर तपस्या करने लगी। इसके बाद उन्होंने पत्ते भी खाना छोड़ दिया फिर हवा पीकर तब किया। इसके बाद उसे भी छोड़ दिया। उनकी बहुत प्रकार से परीक्षा भगवान शिव जी के द्वारा ली गई। अंत में वह एक गुफा में जाकर हजारों वर्ष घनघोर तपस्या की और रेत से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की तपस्या में लीन होकर रात्रि का जागरण किया और भगवान शिव ने उन्हें हस्त नक्षत्र में दर्शन दिया और उन्हें अपनी पत्नी स्वीकार किया यही इस व्रत की कथा है।
हरतालिका तीज में पूजा के लिए थाल में सूखा नारियल, कलश, बेलपत्र, शमी का पत्ता, केले का पत्ता, धतूरे का फल, गाय का घी, मधु, गुलाल, चंदन, सुगंधित इत्र, 5 फल, सुपारी, अक्षत, धूप, दीप, कपूर, गंगाजल, दूब और बेल पत्र रखकर पूजा करते हैं। माता पार्वती को सिंदूर, बिंदी, कुमकुम, मेंहदी, बिछिया, काजल, चूड़ी, कंघी, महावर, साड़ी इत्यादि भेंट करते हैं। दान करने वाली और पहनने वाली साड़ी का रंग हरा गुलाबी लाल होना चाहिए लेकिन काला नहीं होना चाहिए। सूर्योदय से पहले उठकर नहा—धोकर श्रृंगार करें। केले के पत्ते का मंडप बनाकर शिव पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। माता पार्वती की चर्चा उनकी कथाएं करें। 3 बार आरती करें और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनें। सबसे सरल मंत्र है— ओम शिव पार्वत्यै नमो नमः मंत्र का जाप करें और भी मंत्र पढ़ सकते हैं।
इस बार इस व्रत का पारण 27 अगस्त को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। यदि कष्ट बीमारी रोग हो तो यह कठिन व्रत नहीं करना चाहिए। अगर किसी कारण से व्रत के कालखंड में तबीयत बिगड़ने लगे तो चंद्रमा को अर्घ देकर पानी पीकर फलाहार किया जा सकता है। याद रखें— बालक, वृद्ध, रोगी महिलाओं को हर व्रत में विशेष प्रकार की छूट दी गई है। इस प्रकार यह हरतालिका तीज का व्रत जो भगवती माता पार्वती को समर्पित है, हर इच्छाओं को पूरा करने वाला है।